वासना की तृप्ति-2

जब मैं वापिस कमरे में आया तो देखा कि मेरी गुमसुम चाची अपने कपड़े पहन रही थी।

तब मैं उनके होंठों और गालों को चूम कर बैड पर लेट गया।

चाची कपड़े पहन कर पता नहीं क्या सोचती हुए मेरे पास ही बैड पर बैठ गयी और मुझे थकावट के कारण शीघ्र ही मेरी आँख लग गई।

शाम छः बजे जब मेरी आँख खुली और मैं नीचे की मंजिल पर गया तो देखा कि मम्मी आ चुकी थी।

उन्होंने मुझे देखते ही पूछा- अब तबियत कैसी है?

मैंने उत्तर दिया- पहले से अब तो बेहतर है।

तब माँ ने कहा- बहुत अच्छी बात है कि तुम्हें आराम मिल गया। बैठो, मैं तृप्ति को कहती हूँ, वह तुम्हें यहीं चाय दे देगी।

फिर माँ ने ऊँची आवाज़ में बोली- तृप्ति, मैं नहाने जा रही हूँ। संजू उठ गया है तुम उसको चाय बना कर दे दो।

रसोई में से चाची की आवाज़ आई- अच्छा जीजी…

कुछ देर के बाद चाची चाय का कप ले कर आई और मेरे सामने रख कर जाने लगी तभी मैंने हाथ बढ़ा कर धीरे से उनकी चूचियों को मसल दिया।

वह कुछ भी नहीं बोली और चुपचाप मुड़ कर रसोई में चली गयी तथा अपने काम में व्यस्त हो गई।

चाय पीकर जब मैं रसोई में कप रखने गया तो देखा की चाची बर्तन धो रही थी और उसकी पीठ मेरे ओर थी।

तब मैंने कप देने के बहाने उनकी पीठ से चिपक कर अपने बाजूओं को उनके चारों ओर से आगे करते हुए उन्हें कप पकड़ाया।

उन्होंने जैसे ही मेरे हाथ से कप पकड़ा मैंने उनको अपने बाहुपाश में ले लिया और उनकी दोनों चूचियों को पकड़ कर जोर से मसल दिया।

चाची दर्द के मारे आह्ह… आह्ह… कर उठी और बोली- संजू, क्या कर रहे हो, मुझे भी दर्द होती है। इतनी जोर से मसलने के बदले अगर थोड़ा आराम से सहलाते तो दोनों को ही आनन्द मिलता।

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चाची की बात सुन कर मैंने बहुत ही आराम से कुछ देर उनकी चूचियों को सहलाया और फिर उनके होंठों को चूम कर अपने कमरे में चला गया।

अगले दो दिन शनिवार और रविवार थे और पापा मम्मी घर पर ही रहते थे इसलिए मुझे चाची के साथ कुछ करने के लिए कोई मौका ही नहीं मिला।

क्योंकि सोमवार सुबह तो मुझे कोई मौका नहीं मिलने वाला था इसलिए मैं कॉलेज चला गया और आशा थी कि शाम को थोड़ा जल्दी घर आऊँगा तो अवश्य ही मौका मिल जायेगा।

लेकिन शाम को जब मैं कॉलेज से घर आया तो बहुत मायूस होना पड़ा क्योंकि छोटे भाई की कोचिंग समाप्त हो चुकी थी और वह घर पर ही तथा पूरी शाम मुझे अपने कमरे में ही रहना पड़ा।

इसी तरह बृहस्पतिवार तक यानि चार दिन छोटे भाई के घर पर ही होने के कारण मैं चाची के साथ कुछ अधिक नहीं कर सका लेकिन जब भी मौका मिलता था मैं उनकी चूचियों और गालों को ज़रूर मसल देता था।

शुक्रवार सुबह जब मैं नाश्ता कर रहा था, तब मम्मी ने बताया कि उसी दोपहर को वह, पापा और छोटा भाई उसके एयर फ़ोर्स में प्रवेश के सिलसिले में बाहर जा रहे थे और रविवार रात तक ही वापिस आयेंगे।

नाश्ता करके जब मैं बर्तन रखने के लिए रसोई में गया तब चाची को बहुत खुश देखा तब मैंने उनके पास जाकर धीरे से उनकी चूचियों को मसलते हुए उनकी ख़ुशी का कारण पूछा लेकिन वह कुछ नहीं बोली और चुपचाप अपने काम में लगी रही।

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उस दिन मैं कॉलेज से दोपहर दो बजे ही लौट आया तो देखा कि चाची ने फिरोजी रंग की साड़ी पहन रखी थी, हल्का सा मेक-अप भी कर रखा था।

मुझे देखते ही चाची बोली- आ गए संजू। चलो जल्दी से हाथ मुंह धो लो, साथ बैठ कर खाना खायेंगे।

उनके बदले हुए रूप को देख कर मैं चकित रह गया क्योंकि जब से मैंने उनकी चुदाई की थी तबसे वह मुझसे बात ही नहीं करती थी।

मैं फ्रेश होकर जब टेबल पर आया और हम दोनों खाना खाने बैठे तब मैंने देखा की सारा खाना मेरी पसंद का ही था।

खाना खाते हुए मैंने चाची से पूछा- मम्मी पापा किस समय गए?

चाची बोली- वे दोपहर का खाना खाकर एक बजे गए हैं।

मैं बोला- क्या तुम्हें पता था कि वे सब इतने दिनों के लिए बाहर जा रहे हैं?

चाची बोली- हाँ, जीजी ने रात को ही मुझे अपना सारा कार्यक्रम बता दिया था।

मैं बोला- क्या इसीलिए तुम सुबह खुश थी?

चाची बोली- हाँ, मुझे ख़ुशी थी कियोंकि मुझे तुम्हारे साथ अकेले रहने के लिए ढाई दिन और दो रातें मिल रहे थे।

मैंने कहा- इन ढाई दिनों के लिए तुम अपने मायके जा कर नितिन के साथ भी बिता सकती थी?

मेरी व्यंग्य को सुन कर वह बोली- देखो संजू, मैं तुम्हें बताना चाहती हूँ कि मुझे सेक्स करना बहुत पसंद है लेकिन तुम्हारे चाचा के जाने के बाद मैं उससे वंचित रह गई थी।

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